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विराट पर्व
अध्याय ४४
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कृप उवाच
इन्द्रोऽपि हि न पार्थेन संय़ुगे योद्धुमर्हति |  ११   क
यस्तेनाशंसते योद्धुं कर्तव्यं तस्य भेषजम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति