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विराट पर्व
अध्याय ४४
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कृप उवाच
आत्मानं यः समुद्वध्य कण्ठे वद्ध्वा महाशिलाम् |  १५   क
समुद्रं प्रतरेद्दोर्भ्यां तत्र किं नाम पौरुषम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति