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विराट पर्व
अध्याय ४४
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कृप उवाच
अस्माभिरेष निकृतो वर्षाणीह त्रय़ोदश |  १७   क
सिंहः पाशविनिर्मुक्तो न नः शेषं करिष्यति ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति