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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
कृपं शारद्वतं वीरं द्रौणिं च रथिनां वरम् |  ५४   क
भोजं च कृतवर्माणं सहिताञ्शरविक्षतान् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति