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उद्योग पर्व
अध्याय ४४
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धृतराष्ट्र उवाच
आभाति शुक्लमिव लोहितमिव; अथो कृष्णमथाञ्जनं काद्रवं वा |  १८   क
तद्व्राह्मणः पश्यति योऽत्र विद्वा; न्कथंरूपं तदमृतमक्षरं पदम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति