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भीष्म पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीतैः सुसंरव्धा धावमानास्ततस्ततः |  १५   क
व्यदृश्यन्त महाराज परस्परजिघांसवः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति