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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः |  २८   क
प्रहृष्टमनसः सर्वे नलाय़ाष्टौ वरान्ददुः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति