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द्रोण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
सोऽभिमन्युं त्रिभिर्वाणैर्विद्ध्वा वक्षस्यथानदत् |  १२   क
त्रिभिश्च दक्षिणे वाहौ सव्ये च निशितैस्त्रिभिः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति