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द्रोण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा रुक्मरथं रुग्णं पुत्रं शल्यस्य मानिनम् |  १४   क
जीवग्राहं जिघृक्षन्तं सौभद्रेण यशस्विना ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति