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द्रोण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
शूरैः शिक्षावलोपेतैस्तरुणैरत्यमर्षणैः |  १७   क
दृष्ट्वैकं समरे शूरं सौभद्रमपराजितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति