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द्रोण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
एकः स शतधा राजन्दृश्यते स्म सहस्रधा |  २३   क
अलातचक्रवत्सङ्ख्ये क्षिप्रमस्त्राणि दर्शय़न् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति