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कर्ण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
प्रतिरव्धस्ततः कर्णो रोषात्प्रस्फुरिताधरः |  १७   क
शिखण्डिनं त्रिभिर्वाणैर्भ्रुवोर्मध्ये व्यताडय़त् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति