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कर्ण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
धारय़ंस्तु स तान्वाणाञ्शिखण्डी वह्वशोभत |  १८   क
राजतः पर्वतो यद्वत्त्रिभिः शृङ्गैः समन्वितः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति