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कर्ण पर्व
अध्याय ४४
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धृतराष्ट्र उवाच
द्रवमाणे वलौघे च निराक्रन्दे मुहुर्मुहुः |  २   क
किमकुर्वन्त कुरवस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति