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कर्ण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो हय़ान्हत्वा सारथिं च त्रिभिः शरैः |  २०   क
उन्ममाथ ध्वजं चास्य क्षुरप्रेण महारथः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति