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कर्ण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
नकुलस्तु ततः क्रुद्धो वृषसेनं स्मय़न्निव |  ३५   क
नाराचेन सुतीक्ष्णेन विव्याध हृदय़े दृढम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति