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कर्ण पर्व
अध्याय ४४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा तु प्रद्रुतां सेनां धार्तराष्ट्रस्य सूतजः |  ३८   क
निवारय़ामास वलादनुपत्य विशां पते |  ३८   ख
निवृत्ते तु ततः कर्णे नकुलः कौरवान्ययौ ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति