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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
क्रतुर्हरः प्रचेताश्च मनुर्दक्षस्तथैव च |  १०   क
ऋतवश्च ग्रहाश्चैव ज्योतींषि च विशां पते ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति