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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
चतुष्पथरता चैव भूतितीर्थान्यगोचरा |  २७   क
पशुदा वित्तदा चैव सुखदा च महाय़शाः |  २७   ख
पय़ोदा गोमहिषदा सुविषाणा च भारत ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति