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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
पाशोद्यतकराः केचिद्व्यादितास्याः खराननाः |  १०३   क
पृथ्वक्षा नीलकण्ठाश्च तथा परिघवाहवः ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति