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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा मुसलपाणय़ः |  १०४   क
शूलासिहस्ताश्च तथा महाकाय़ा महावलाः ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति