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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
अभिषेकं कुमारस्य दृष्ट्वा हृष्टा रणप्रिय़ाः |  १०७   क
घण्टाजालपिनद्धाङ्गा ननृतुस्ते महौजसः ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति