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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्चानेकशृङ्गवान् |  १३   क
ऐरावतः सानुचरः कलाः काष्ठास्तथैव च |  १३   ख
मासार्धमासा ऋतवस्तथा रात्र्यहनी नृप ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति