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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
उच्चैःश्रवा हय़श्रेष्ठो नागराजश्च वामनः |  १४   क
अरुणो गरुडश्चैव वृक्षाश्चौषधिभिः सह ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति