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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
जगृहुस्ते तदा राजन्सर्व एव दिवौकसः |  १७   क
आभिषेचनिकं भाण्डं मङ्गलानि च सर्वशः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति