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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
पुरा यथा महाराज वरुणं वै जलेश्वरम् |  २०   क
तथाभ्यषिञ्चद्भगवान्व्रह्मा लोकपितामहः |  २०   ख
कश्यपश्च महातेजा ये चान्ये नानुकीर्तिताः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति