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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्थाणुं महावेगं महापारिषदं क्रतुम् |  २३   क
माय़ाशतधरं कामं कामवीर्यवलान्वितम् |  २३   ख
ददौ स्कन्दाय़ राजेन्द्र सुरारिविनिवर्हणम् ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति