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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
परिघं च वटं चैव भीमं च सुमहावलम् |  ३१   क
दहतिं दहनं चैव प्रचण्डौ वीर्यसंमतौ |  ३१   ख
अंशोऽप्यनुचरान्पञ्च ददौ स्कन्दाय़ धीमते ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति