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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्क्रोशं पङ्कजं चैव वज्रदण्डधरावुभौ |  ३२   क
ददावनलपुत्राय़ वासवः परवीरहा |  ३२   ख
तौ हि शत्रून्महेन्द्रस्य जघ्नतुः समरे वहून् ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति