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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
चक्रं विक्रमकं चैव सङ्क्रमं च महावलम् |  ३३   क
स्कन्दाय़ त्रीननुचरान्ददौ विष्णुर्महाय़शाः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति