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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
वर्धनं नन्दनं चैव सर्वविद्याविशारदौ |  ३४   क
स्कन्दाय़ ददतुः प्रीतावश्विनौ भरतर्षभ ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति