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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
सुदर्शनीय़ौ वरदौ त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ |  ३८   क
सुप्रभं च महात्मानं शुभकर्माणमेव च |  ३८   ख
कार्त्तिकेय़ाय़ सम्प्रादाद्विधाता लोकविश्रुतौ ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति