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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
स्थिरं चातिस्थिरं चैव मेरुरेवापरौ ददौ |  ४४   क
महात्मनेऽग्निपुत्राय़ महावलपराक्रमौ ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति