वन पर्व  अध्याय २८

वैशम्पाय़न उवाच

सुखोचितमदुःखार्हं दुरात्मा ससुहृद्गणः |  ६   क
ईदृशं दुःखमानीय़ मोदते पापपूरुषः ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति