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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणश्रवाः कपिस्कन्धः काञ्चनाक्षो जलन्धमः |  ५३   क
अक्षसन्तर्जनो राजन्कुनदीकस्तमोभ्रकृत् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति