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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजटः प्रभुः |  ५४   क
सहस्रवाहुर्विकटो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति