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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्दंष्ट्रोऽष्टजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः |  ५७   क
विद्युदक्षो धनुर्वक्त्रो जठरो मारुताशनः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति