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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
उदराक्षो झषाक्षश्च वज्रनाभो वसुप्रभः |  ५८   क
समुद्रवेगो राजेन्द्र शैलकम्पी तथैव च ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति