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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
गाय़नो हसनश्चैव वाणः खड्गश्च वीर्यवान् |  ६२   क
वैताली चातिताली च तथा कतिकवातिकौ ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति