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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
ततः स भरतश्रेष्ठो गदापाणिरभिद्रवत् |  ५७   क
प्रमथिष्यन्निव शिरो भीमसेनस्य संय़ुगे ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति