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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः किम्पुरुषावासं सिद्धचारणसेवितम् |  ३४   क
ददृशुर्हृष्टरोमाणः पर्वतं गन्धमादनम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति