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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
योगय़ुक्ता महात्मानः सततं व्राह्मणप्रिय़ाः |  ७२   क
पैतामहा महात्मानो महापारिषदाश्च ह |  ७२   ख
यौवनस्थाश्च वालाश्च वृद्धाश्च जनमेजय़ ||  ७२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति