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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
सहस्रशः पारिषदाः कुमारमुपतस्थिरे |  ७३   क
वक्त्रैर्नानाविधैर्ये तु शृणु ताञ्जनमेजय़ ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति