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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
महाजठरपादाङ्गास्तारकाक्षाश्च भारत |  ८०   क
पारावतमुखाश्चान्ये तथा वृषमुखाः परे ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति