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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्वराः |  ८४   क
स्कन्धेमुखा महाराज तथा ह्युदरतोमुखाः ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति