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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा कीटपतङ्गानां सदृशास्या गणेश्वराः |  ८६   क
नानाव्यालमुखाश्चान्ये वहुवाहुशिरोधराः ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति