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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
चित्रमाल्यधराः केचित्केचिद्रोमाननास्तथा |  ९१   क
दिव्यमाल्याम्वरधराः सततं प्रिय़विग्रहाः ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति