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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
एते चान्ये च वहवस्तत्र काननजा द्रुमाः |  ६८   क
लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोच्चय़ाः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति