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आदि पर्व
अध्याय ४५
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जनमेजय़ उवाच
नास्मिन्कुले जातु वभूव राजा; यो न प्रजानां हितकृत्प्रिय़श्च |  १७   क
विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां; वृत्तं महद्वृत्तपराय़णानाम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति