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आदि पर्व
अध्याय ४५
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सूत उवाच
स कदाचिद्वनचरो मृगं विव्याध पत्रिणा |  २१   क
विद्ध्वा चान्वसरत्तूर्णं तं मृगं गहने वने ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति